Tuesday, June 14, 2011

संतान बाधा

जन्मपत्रिका में पांचवां भाव संतान से संबंधित माना जाता है। यही भाव संचित कर्मों का माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि संचित कर्म और संतान में कोई परस्पर संबंध है अत: संतान हो या ना हो, अच्छी हो या खराब, कम हो या ज्यादा हो, इन सब का संबंध संचित कर्मों के आधार पर माना जा सकता है। यदि पंचम भाव बलवान हो तो सामान्यतया निष्कर्ष यह है कि संचित कर्म खूब इकट्ठे हैं और वे इस व्यक्ति को भोग लें। यदि किसी के पंचम भाव में बहुत अधिक शुभ प्रभाव हो या अष्टक वर्ग में बहुत अधिक बिंदु हों या पंचमेश उच्चादि राशि में हो तो यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि इस व्यक्ति को लौकिक सुख संपत्ति बहुत मिलेगी, संतानें भी कई होंगी और वह खूब भोग करेगा। गतजन्मों के संचित कर्म यदि बहुत अधिक हों तो इसका अर्थ यह है कि इस जन्म में व्यक्ति को लौकिक सुख बहुत अधिक मिलेंगे।
यह तथ्य इस बात का विरोधी है कि बलवान भाव बहुत सुख करता है। पंचम भाव का बलवान होना और बहुत सुख प्रदान करना मोक्ष प्राप्ति में बाधक सिद्ध हो सकता है। संचित कर्मों से फायदा जितना अधिक कम होता चला जाए ,व्यक्ति मुक्त होने के मार्ग पर उतना ही तेजी से आगे बढ़ता है इसीलिए महान् लोगों की जन्मकुण्डलियों में पंचम भाव में अष्टक वर्ग बिन्दु संख्या में कम मिलेंगे।
यदि पंचम भाव में 24 से कम शुभ बिन्दु हों तो किसी एक योग की तरह समझा जाना चाहिए क्योंकि व्यक्ति लौकिक संपत्तियों से दूर होता चला जाएगा और कर्म संचय को परोपकार या अन्य माध्यम से नष्ट करता हुआ चला जाएगा। मैं यह कहना चाहता हँू कि पंचम भाव में अष्टक वर्ग बिन्दु कम होना, व्यक्ति को संसार से मुक्त करने की राह दिखाता है।
जीवन में अचानक मोड़ :प्राय: जिन बातों को लेकर व्यक्ति के जीवन में क्रांतिकारी मोड़ या संन्यास जैसी स्थितियां आ जाती हंै, वे बातें या घटनाएं निम्न तरह से हो सकती हैं-
1. पत्नी की कम उम्र में मृत्यु।
2. जवानी में ही संतान की मृत्यु।
3. पत्नी या प्रेमिका की बेवफाई।
4. विपरीत परिस्थितियों में आत्म-विश्वास खत्म होना।
हम जानते हैं कि कालिदास और तुलसीदास पत्नी के द्वारा उपहास करने के बाद परिवर्तित हो गए और बाद में उस मार्ग पर नहीं लौटे। इतिहास में ऐसे भी उल्लेख हैं कि जब राजा ने राजपाट त्याग दिया और जंगल में चले गए। महाराज भर्तृहरि ने पत्नी की बेवफाई से तिरस्कृत होकर राजपाट छोड़ दिया और संन्यास ले लिया। ऐसे कुछ मामले संतान को लेकर भी हुए।
पंचम भाव में पाप ग्रह:पंचम भाव में पाप ग्रह का होना मात्र संतान के लिए हानिकारक है। अगर दो पापग्रह पंचम भाव में हों तो संतान का नष्ट होना देखने में आता है। ऐसे कुछ योग बहुत प्रसिद्ध हैं जिनमें संतान या तो होती ही नहीं या होने के बाद नष्ट हो जाती है। मंत्रेश्वर जिनका नाम पहले मार्कण्डेय भट्टाद्रि था, के अनुसार कुछ योग संतान हानि कराते हैं :
1. लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति से पांचवां भाव पापग्रहों से युक्त हो या दृष्ट हो और उन स्थानों में शुभ ग्रह नहीं बैठे हों और ना ही इन स्थानों को शुभ ग्रह देखें।
2. लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति जिस राशि में हों, उस राशि के स्वामी 6, 8, 12 भाव में स्थित हों।
3. लग्न, चंद्रमा और बृहस्पति पापक र्तरि में हों अर्थात् भाव के दोनों ओर पापग्रह बैठे हों।
4. वृष, सिंह, कन्या और वृश्चिक को कम संतान वाली राशियां माना जाता है। ये राशियां अगर पांचवें भाव में पड़ें और शनि लग्न में हों, बृहस्पति अष्टम में हों और मंगल बारहवें हों।
5. पांचवें भाव में उपरोक्त चार राशियों में से कोई एक हो और उसमें सूर्य हों तथा अष्टम भाव से शनि देख रहे हों और लग्न में मंगल हों।
6. मंत्रेश्वर ने एक और योग के महत्व की चर्चा की है। इस योग के अनुसार यदि पांचवें घर में कर्क राशि हों और उसमें सूर्य, मंगल या शुक्र में कोई अकेले स्थित हों तो प्रथम पत्नी से पुत्र प्राप्ति नहीं होती है और दूसरा विवाह करने पर भी पुत्र प्राप्ति होती है परंतु पंचम भाव में कर्क राशि के अकेले शनि कई पुत्र दे देते हैं। कर्क राशि में ही पंचम भाव में बुध हों तो थोड़े पुत्र होते हैं। चंद्रमा अकेले ही कर्क राशि के पंचम भाव में हो तो कम संख्या में पुत्र होते हैं परंतु यदि बृहस्पति पंचम भाव में अकेले ही बैठ जाएं तो निश्चय ही उच्च राशि में होंगे और व्यक्ति के कन्याएं बहुत जन्म लेंगी। पंचम भाव में उच्च के बृहस्पति ही कन्याएं नहीं देते हमने धनु के बृहस्पति में भी कई कन्याओं को होते देखा है।
7. यदि घर का मालिक नीच राशि में हो, शत्रु राशि में हो या अस्त हो तथा 6, 8या 12वें भाव के स्वामी के साथ युति करता हो तो संतान नष्ट होती है।
पंचम भाव पर शनि, राहु या मंगल का प्रभाव संतान की मृत्यु हिंसा से कराता है। वृहत् पाराशर होराशास्त्र में मंगल, राहु या बुध के प्रभाव से गतजन्म के शाप से संतान हानि योग बताए गए हैं।
संतान प्राप्ति के लिए किए जाने वाले उपाय: निम्न मेें से कोई एक उपाय संतान प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है।
1. भद्रा, चतुष्पाद, नाग, किंस्तुघ्न या शकुन करण हो तो भगवान श्रीकृष्ण की पुरुषसूक्त मंत्रों से पूजा करें।
2. षष्ठी तिथि आए तो भगवान कार्तिक का पूजन करें।
3. यदि चतुर्थी तिथि आए तो नागराज का पूजन करंे।
4. यदि अष्टमी तिथि हो तो श्रावण व्रत करें।
5. यदि नवमी तिथि हो तो रामायण का स्मरण करें।
6. यदि द्वादशी तिथि हो तो अन्न दान करें।
7. यदि चतुदर्शी आए तो भगवान रुद्र की पूजा करें।
8. यदि अमावस्या या पूर्णिमा हो तो पितरों की तृप्ति करें।
9. कृष्ण पक्ष में तिथियों को दूर करना ज्यादा फलदायी होता है।
किस ग्रह की बाधा :
1. किसी विद्वान ज्योतिषी से यह तय कराएं कि किस ग्रह की बाधा के कारण संतान नहीं हो रही है। यदि बाधाकारक ग्रह सूर्य हैं तो भगवान शम्भु या गरुड़ या पितरों के शाप का फल है।
2. यदि चंद्रमा के कारण संतान बाधा है (जैसे पंचमेश चंद्रमा अष्टम में बैठे हों और पापदृष्ट हों) तो माता या किसी सधवा स्त्री को दु:ख पहुंचाने के कारण भगवती का शाप है।
3. यदि मंगल ग्रह के कारण बाधा हो तो रामदेवता, भगवान कार्तिक स्वामी या शत्रुओं या भाई के शाप से संतान कष्ट है।
4. यदि बुध ग्रह संतान में बाधा डाल रहे हैं तो बिल्ली को मारने के कारण या मछलियों के या अन्य प्राणियों के अण्डों को नष्ट करने के कारण या बालक-बालिकाओं को मारने के कारण।
5. यदि जन्मकुण्डली में बृहस्पति अशुभ स्थिति में हों तो या तो इस जन्म में या पूर्वजन्म में फलदार वृक्ष काटे हैं या अपने गुरु से विद्रोह किया है।
6. यदि शुक्र के कारण संतान नहीं हो रही है तो इस व्यक्ति ने पुष्प वाले वृक्षों को कटवाया है या गाय के प्रति अपराध किया है या साध्वी स्त्री के शाप के कारण ऐसा हुआ है या शनि के शाप के कारण भी संतान नष्ट होती है।
7. यदि शनि के कारण संतान हानि हैं तो गतजन्म में व्यक्ति ने पीपल के पेड़ काटे है या पिशाच या यमराज के शाप के कारण ऐसा हुआ है।
8. यदि राहु पंचम में हों या पंचमेश को पीडि़त कर रहे हो तो सर्प के शाप से, यदि यह योग केतु में हो तो ब्राह्मण के शाप के कारण संतान हानि होती है।9. यदि गुलिक पंचम में हों तो प्रेत के शाप के कारण ऐसा होता है। मृत आत्माओं को प्रेत कहते हैं।
उपाय :
1. जिस ग्रह के कारण संतान हानि हो रही हो तो उस ग्रह के लिए जप, दान और शुभ क्रियाएं करनी चाहिएं। राहु के लिए नागदेव का पूजन कराना जरूरी है।
2. संतान प्राप्ति के लिए विष्णु या कृष्ण की पूजा श्रेष्ठ बताई गई है।

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