Saturday, September 25, 2010

केतु


नवग्रहों में सबसे विलक्षण और सबसे रहस्यमय केतु को माना गया है। ऋषियों ने या तो केतु की बहुत अधिक आलोचना की है या बहुत अधिक प्रशंसा। जैमिनि ऋषि ने केतु को अत्यन्त शुभ फलप्रद माना है। आध्यात्म या मोक्ष को मनुष्य का परम लक्ष्य मानते हुए केतु को इसका कारक माना है। पौराणिक कथाओं में राहु को सिर व केतु को पूंछ माना गया है। अमृत चखने के बाद जब भगवान विष्णु ने शिरोच्छेद कर दिया तो राहु और केतु भी अमर हो गये और उन्हें देवयोनि प्राप्त हुई। राक्षस देवता हो गये और उन्हें ब्रrाा की सभा में बैठने का अधिकार मिल गया। अब नवग्रह मण्डल प्रतिष्ठा में राहु और केतु को अन्य देवताओं की तरह ही स्थान मिलता है और उन्हें यज्ञ भाग का अधिकार है। परन्तु राहु और केतु छाया ग्रह होने के कारण फल देने में अन्य ग्रहों से कुछ अलग हैं और उनकी गति के नियम भी अन्य ग्रहों से विपरीत हैं।
केतु के विषय
जैमिनि ज्योतिष में केतु को गणित, संन्यास, मानव-विज्ञान, चिकित्सा, विष चिकित्सा, शिकार, पाषाण कला, सींगों वाले पशुओं का व्यापार, दलाली, सम्पत्ति का आदान-प्रदान, ध्वजारोहण और सम्मान, अचानक घटी-घटनाएँ और सूक्ष्म वस्तुओं का स्वामी माना गया है। केतु छिद्रान्वेष्ाण में कुशल हैं और पार्थक्य के ग्रह हैं। केतु तर्क के अधिष्ठाता हैं और वाणी में शुष्कता लाते हैं।
केतु और आध्यात्म
केतु वेदान्त, दर्शन, तपस्या, ब्रrा ज्ञान, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्तियाँ, हठयोग, ध्वजारोहण एवं शारीरिक कष्टों के कारक माने गये हैं। आध्यात्मिक शक्तियों के उत्थान में केतु को श्रेष्ठ माना गया है।
जैमिनि ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म से बारहवें भाव में केतु हों और बृहस्पति हों या दोनों का परस्पर संबंध हो जाये तो केतु मोक्षकारक सिद्ध होते हैं। केतु त्याग कराते हैं या मोह भंग कराते हैं। केतु विरक्ति के कारक हैं। संसार से मोह भंग करके ईश्वर आराधना में ले जाने के लिए केतु को श्रेष्ठ माना गया है। जैमिनि ऋçष्ा ने मीन या कर्क राशि में केतु होने पर उसे मोक्ष का कारक माना है। लग्न से बारहवें भाव में केतु होने पर पाराशर ने भी उसे मोक्षकारक माना है। परन्तु पाराशर के अनुसार केतु पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होना आवश्यक है।
जैमिनि ने अपने कारकांश लग्न के सिद्धान्त को आगे बढ़ाने पर यह कहा है कि कारकांश लग्न से बारहवें स्थान में सूर्य और केतु हों तो व्यक्ति शिवभक्त होता है, परन्तु केवल केतु हों, तो गणेश व स्कन्ध में भक्ति होती है। स्कन्ध कार्तिकेय को कहा गया है। द्वादश भाव में केतु हों और बृहस्पति वहाँ स्थित हों या कहीं से दृष्टि कर रहे हों, तो व्यक्ति संन्यास जैसी स्थिति में आ जाता है और मोक्ष प्राçप्त की ओर बढ़ता है। द्वादश भाव के स्वामी यदि केतु और बृहस्पति से संबंध कर लें तो भी व्यक्ति मोक्ष मार्ग की ओर प्रवृत्त होता है और इस तर्क के आधार पर वह गृहस्थ संन्यास जैसी स्थिति में पहुंच जाता है।
केतु के अन्य फल
जैमिनि ऋषि के अनुसार कारकांश लग्न में यदि केतु हों, तो व्यक्ति हाथियों का व्यापार करता है और चोरवृत्ति भी हो सकती है। कोई ग्रह जब कुण्डली में सर्वाधिक अंशों पर हों, तो वह ग्रह जिस नवमांश में स्थित होता है, वह नवमांश, कारकांश कहलाता है। कारकांश लग्न में यदि केतु हों और उसे पापग्रह के कान कट सकते हैं परन्तु कारकांश लग्न में आत्मकारक ग्रह बैठा हो, वहाँ केतु भी हो और शुक्र ग्रह उन्हें देखते हों, तो मनुष्य धार्मिक क्रियाओं में निपुण होता है।
नवग्रहों में सबसे विलक्षण और सबसे रहस्यमय केतु को माना गया है। ऋषियों ने या तो केतु की बहुत अधिक आलोचना की है या बहुत अधिक प्रशंसा। जैमिनि ऋषि ने केतु को अत्यन्त शुभ फलप्रद माना है। आध्यात्म या मोक्ष को मनुष्य का परम लक्ष्य मानते हुए केतु को इसका कारक माना है।
पौराणिक कथाओं में राहु को सिर व केतु को पूंछ माना गया है। अमृत चखने के बाद जब भगवान विष्णु ने शिरोच्छेद कर दिया तो राहु और केतु भी अमर हो गये और उन्हें देवयोनि प्राप्त हुई। राक्षस देवता हो गये और उन्हें ब्रrाा की सभा में बैठने का अधिकार मिल गया। अब नवग्रह मण्डल प्रतिष्ठा में राहु और केतु को अन्य देवताओं की तरह ही स्थान मिलता है और उन्हें यज्ञ भाग का अधिकार है। परन्तु राहु और केतु छाया ग्रह होने के कारण फल देने में अन्य ग्रहों से कुछ अलग हैं और उनकी गति के नियम भी अन्य ग्रहों से विपरीत हैं।
केतु के विषय
जैमिनि ज्योतिष में केतु को गणित, संन्यास, मानव-विज्ञान, चिकित्सा, विष चिकित्सा, शिकार, पाषाण कला, सींगों वाले पशुओं का व्यापार, दलाली, सम्पत्ति का आदान-प्रदान, ध्वजारोहण और सम्मान, अचानक घटी-घटनाएँ और सूक्ष्म वस्तुओं का स्वामी माना गया है। केतु छिद्रान्वेष्ाण में कुशल हैं और पार्थक्य के ग्रह हैं। केतु तर्क के अधिष्ठाता हैं और वाणी में शुष्कता लाते हैं।
केतु और आध्यात्म
केतु वेदान्त, दर्शन, तपस्या, ब्रrा ज्ञान, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्तियाँ, हठयोग, ध्वजारोहण एवं शारीरिक कष्टों के कारक माने गये हैं। आध्यात्मिक शक्तियों के उत्थान में केतु को श्रेष्ठ माना गया है।
जैमिनि ज्योतिष के अनुसार यदि जन्म से बारहवें भाव में केतु हों और बृहस्पति हों या दोनों का परस्पर संबंध हो जाये तो केतु मोक्षकारक सिद्ध होते हैं। केतु त्याग कराते हैं या मोह भंग कराते हैं। केतु विरक्ति के कारक हैं। संसार से मोह भंग करके ईश्वर आराधना में ले जाने के लिए केतु को श्रेष्ठ माना गया है। जैमिनि ऋçष्ा ने मीन या कर्क राशि में केतु होने पर उसे मोक्ष का कारक माना है। लग्न से बारहवें भाव में केतु होने पर पाराशर ने भी उसे मोक्षकारक माना है। परन्तु पाराशर के अनुसार केतु पर शुभ ग्रहों की दृष्टि होना आवश्यक है। जैमिनि ने अपने कारकांश लग्न के सिद्धान्त को आगे बढ़ाने पर यह कहा है कि कारकांश लग्न से बारहवें स्थान में सूर्य और केतु हों तो व्यक्ति शिवभक्त होता है, परन्तु केवल केतु हों, तो गणेश व स्कन्ध में भक्ति होती है। स्कन्ध कार्तिकेय को कहा गया है।
द्वादश भाव में केतु हों और बृहस्पति वहाँ स्थित हों या कहीं से दृष्टि कर रहे हों, तो व्यक्ति संन्यास जैसी स्थिति में आ जाता है और मोक्ष प्राçप्त की ओर बढ़ता है। द्वादश भाव के स्वामी यदि केतु और बृहस्पति से संबंध कर लें तो भी व्यक्ति मोक्ष मार्ग की ओर प्रवृत्त होता है और इस तर्क के आधार पर वह गृहस्थ संन्यास जैसी स्थिति में पहुंच जाता है।
केतु के अन्य फल
जैमिनि ऋषि के अनुसार कारकांश लग्न में यदि केतु हों, तो व्यक्ति हाथियों का व्यापार करता है और चोरवृत्ति भी हो सकती है। कोई ग्रह जब कुण्डली में सर्वाधिक अंशों पर हों, तो वह ग्रह जिस नवमांश में स्थित होता है, वह नवमांश, कारकांश कहलाता है। कारकांश लग्न में यदि केतु हों और उसे पापग्रह देखें तो मनुष्य के कानों में रोग होता है या उसके कान कट सकते हैं परन्तु कारकांश लग्न में आत्मकारक ग्रह बैठा हो, वहाँ केतु भी हो और शुक्र ग्रह उन्हें देखते हों, तो मनुष्य धार्मिक क्रियाओं में निपुण होता है।
कारकांश लग्न में ही केतु हों और उसे बुध व शनि देख लें तो व्यक्ति नपुंसक होता है। यदि बुध और शुक्र देख लें तो एक ही बात को बार-बार दोहराता है।
केतु और मकान
कारकांश लग्न से चौथे में केतु की दृष्टि हो या केतु वहाँ बैठे हों, तो ईटों का बना हुआ मकान होता है।
केतु और गणित
पाराशर मत में भी केतु यदि दूसरे भाव में हो या दूसरे भाव के स्वामी के साथ संबंध स्थापित करते हों या चौथे भाव में केतु हों, तो गणित में निष्णात बनाते हैं। द्वितीय भाव में बैठे हुए केतु में दो तरह के दोष हो सकते हैं। या तो व्यक्ति की वाणी में दोष आ जाए और वह अटक-अटक कर बोले या उसकी बोली में क़डवाहट हो सकती है।
केतु के अन्य विषय
पाराशर ने केतु को सेना भी माना है। चर्म रोगों का कारक केतु को माना गया है। केतु को संकर जातियों का अधिपति भी माना गया है। छिद्र युक्त वस्त्र और दाँत भी केतु विषय माने गये हैं। गण्डान्त नक्षत्रों में छ: में से तीन नक्षत्र ऎसे हैं जिनके स्वामी केतु हैं। अश्विनी, मघा और मूल केतु के नक्षत्र हैं।
केतु का दशाफल
ऋषि पाराशर के अनुसार यदि केन्द्र स्थान के स्वामी के साथ केतु केन्द्र में ही स्थित हों तो अपने दशाकाल में अत्यन्त शुभ फल करते हैं। केतु यदि शुभ ग्रहों के साथ हों और केन्द्र-त्रिकोण में स्थित हों तो अत्यन्त शुभ करते हैं। परन्तु यदि केतु नीच राशि में हों (मिथुन या किसी के अनुसार वृषभ) तथा किसी अस्त ग्रह के साथ हों तो कष्टप्रद होते हैं। यदि आठवें या बारहवें भाव में हो तो ह्वदय रोग, मान-हानि, पशु धन का नाश, स्त्री-पुत्र को कष्ट तथा मन में चंचलता होती है। यदि दूसरे भाव के स्वामी या सातवें भाव के स्वामी के साथ हों तो रोगभय, कष्ट और अपने बंधुओ का विनाश होता है। केतु को दूसरे और सातवें भाव में अच्छा नहीं माना गया है। सातवें भाव में यदि केतु हों तो वैवाहिक संबंधों में कष्टकारक होते हैं और पति-पत्नी के बीच में कलह का कारण बनते हैं। यदि किसी भी महादशा में महादशानाथ से 6, 8, 12 में पापग्रह के साथ केतु हों तो बहुत कष्ट लाते हैं और अगर केन्द्र-त्रिकोण में हों तो शुभफल देते हैं।
केतु के मित्र और शत्रु
मंगल-केतु के मित्र जैसे हैं और उनकी राशियां मेष और वृश्चिक में केतु शुभफल देते हैं। कई बार यह कहा गया है कि केतु कुजवत् परिणाम देते हैं। कुज मंगल को कहा गया है। केतु सबसे शानदार परिणाम बृहस्पति की राशियों में देते हैं। मीन राशि केतु की स्वराशि मानी गई है और धनु राशि केतु की उच्चा राशि मानी गई है। इन राशियों में स्थित केतु अपनी दशा में व्यक्ति को धनी बना देते हैं और घर में तरह-तरह की समृद्धि आती है। केतु की दशा में जब व्यक्ति व्यापार करता है तो छोटे आकार की वस्तुओं से लाभ होता है। केतु को सूक्ष्मकाय कहा गया है और कदाचित् बैक्टीरिया और वायरस से केतु का संबंध जो़डा जाना उचित है। इसीलिए त्वचा रोगों में इंफेक्शन इत्यादि होते हैं तो केतु का पूजा-पाठ शुभफल दे सकता है।
केतु का दशाकाल
राहु-केतु दोनों की समान गति है और राशि चक्र में वे एक-दूसरे से 1800 पर स्थित होते हैं तथा अन्य ग्रहों से विपरीत गति होती है परन्तु आश्चर्यजनक रूप से राहु का महादशाकाल 18 वर्ष माना गया है और केतु का महादशाकाल 7 वर्ष माना गया है। इस अन्तर का कारण किसी भी भारतीय वाङग्मय में उपलब्ध नहीं है।
राहु और केतु में अंतर

राहु को संसार भवसागर में बंधन कारक माना गया है, जबकि केतु को मोक्षकारक माना गया है। राहु माया के प्रतिनिधि हैं, जबकि केतु माया के नष्ट होने में रूचि लेते हैं। राहु ने अमृत पी लिया था परन्तु अमृतकण पेट में चले जाने के कारण केतु को अमरत्व प्राप्त हुआ था इसलिए केतु अपनी महादशाकाल में इस तरह की घटनाओं को जन्म देते हैं कि व्यक्ति का रिश्ते-नातों से मोह टूट जाता है और वह ईश्वर की शरण मे चला जाता है।
ग्रहण
राहु और केतु दोनों ही सूर्य और चन्द्रग्रहण के कारण बन सकते हैं। कई बार अमावस्या को ग्रहण प़डता है और वह राहु के कारण है तो अगली पूर्णिमा को केतु के कारण चन्द्र ग्रहण हो सकता है।

वैदिक दर्शन का ब़डा चोर- स्टीफन हॉकिंग

भारतीय दर्शन से चोरी करके अपने नाम से सिद्धांत गढ़ देना पाश्चात्य वैज्ञानिकों की पुरानी आदत है। हर खगोलीय सिद्धांत उन्होंने उपनिषदों से या वैदिक धारणाओं से चुराया और अपने नाम से गढ़ दिया। भारतीय ऋषियों को तो अपनी शोध के आगे नाम न लिखने की त्याग भावना थी और इन आधुनिक वैज्ञानिकों को चोरी के माल को अपने नाम से कर लेने की आदत है। मैं कुछ ऎसे सिद्धांत, जो भारतीय परम्परा से उ़डा लिए गए उनकी चर्चा करके और उनके उस नए सिद्धांत की चर्चा करूंगा जिसमें उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार दिया है।
1. विश्व को माया माना गया है। वेदांत के अन्तर्गत ईश्वर सृष्टि को प्रकट करने के लिए माया का सहारा लेते हैं। माया को मिथ्या माना गया है।
2. स्टीफन हॉकिंग्स ने ब्लैकहोल का सिद्धांत बताते हुए उसे वैदिक अवधारणाओं की तरफ ले जाने का प्रयास किया।
3. "ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" में उन्होंने स्पष्टत: स्वीकार किया कि बिग बैंग (खगोलीय महाविस्फोट) से ठीक पहले ब्रrााण्डीय रचना जाल की कोई न कोई योजना ईश्वर प्रदत्त थी। वे स्वीकार कर चुके थे कि ब्लैकहोल का सिद्धांत पहले से मौजूद था और 200 वष्ाü के चिंतन के बाद अमेरिकन वैज्ञानिक व्हीलर ने इसे प्रकट किया।
4. इससे पूर्व भी "शून्य" की अवधारणा भारतीय वाङग्मय में उपलब्ध थी जो पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने ग्रहण की।
5. श्रीपति ने कैपलर से सैक़डों वर्ष पूर्व कक्षाओं के दीर्घवृत्त में होने का तर्क प्रस्तुत किया था।
6. ग्रहों की अवधारणा में भारतीयों ने बहुत पहले बता दिया था कि असंख्य मंदाकिनियां खगोल मे उपलब्ध हैं और उनके अलग-अलग ब्रrाा, विष्णु, महेश हैं। गर्ग संहिता और ब्रrावैवर्त पुराण मे इस अवधारणा को खुलकर कहा गया है। अब हम जानते हैं कि असंख्य मंदाकिनियां हैं परन्तु पाश्चात्य वैज्ञानिक इनकी योजक कç़डयों को नहीं खोज पाए हैं। गर्ग संहिता बताती है कि भगवान कृष्ण ही इन सबके महायोजनाकार हैं।
7. भारतीय ज्योतिष मे मंगल को भूमि पुत्र कहा गया है। आधुनिक खगोल शास्त्री आज तक यह सिद्ध नहीं कर पाए हैं कि यह पृथ्वी से कब अलग हुआ।
8. बुध को चन्द्र तनय कहा गया है। ऎसा तब कभी हुआ होगा जब पृथ्वी और सूर्य के बीच मे चन्द्रमा एक ब़डा पिण्ड था और सूर्य के आकर्षण से वह टूट गया और बुध, शुक्र की परिक्रमा को पार करके भी सूर्य का सबसे निकटस्थ ग्रह हो गया। ऎसी घटनाएं होती रहती हैं परन्तु भारतीय ऋषियों को इसका पता था और खगोल वैज्ञानिक इस खोज को उ़डा ले गए। पौराणिक मिथक हैं कि बुध को लेकर चन्द्रमा और बृहस्पति में प्रतिद्वंद्विता थी। शास्त्र बताते हैं कि आधुनिक बुध, बृहस्पति की परिक्रमा में भी जा सकता था। इससे संकेत है कि बृहस्पति और शुक्र के गुरूत्वाकर्षण बल अत्यधिक रहे हैं और संभवत: सूर्य के टूटने की प्रक्रिया में बृहस्पति कदाचित् सबसे ब़डा पिण्ड रहा होगा। सौरमण्डल में आज भी बृहस्पति सबसे ब़डे हैं।
9. राहु-केतु की अवधारणाएं तब दी गई जबकि कोई दूरबीन नहीं थी और ग्रहों को नंगी आंखों से देखा जाना या समझ पाना बहुत मुश्किल था। फिर राहु-केतु तो अदृश्य थे व गणितीय बिन्दु थे। न केवल उनकी स्थिति का पता लगाया गया बल्कि उनकी गति का भी पता लगाया गया। परन्तु यह सिद्धांत पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने उठा लिया।
10. सूर्य के स्पैक्ट्रम को लेकर भी वैदिक ऋषि एकदम स्पष्ट थे और उन्हें सप्ताश्व या सप्तरश्मि बताया गया। द्वादश आदित्य के सिद्धांत के माध्यम से भी उन्होंने सूर्य के विभिन्न वर्गीकरण किए जो कि आगे चलकर राशियों इत्यादि के आधार बने। यह सब किसी न किसी रूप मे वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया और अपनी-अपनी शोध में इसे शामिल किया।
11. अखिल ब्रrााण्ड के कई आयामी होने और निरन्तर विस्तार की अवधारणाएं भारतीय दर्शनों मे मिलती हैं। यह बात बाद में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने अपना ली।
12. स्वयं स्टीफन हॉकिंग्स ने न्यूटन और आइंस्टीन का हवाला देकर यह स्वीकार किया कि ब्रrााण्ड के विस्तार की गति निरन्तर बढ़ रही है तथा किसी भी घटना का भूत और भविष्य दोनों होता है।
13. अनंत गति का सिद्धांत पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने बहुत बाद मे स्वीकार किया। वे हाल तक भी सूर्य रश्मियों की गति से अधिक किसी भी अस्तित्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। मन की गति पर अब शोध चल रही हैं।
14. जीव या आत्मा या चैतन्य के सिद्धांत को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित करने में बहुत बाधा थी। चैतन्य या आत्मा नित्य है और सत्य है तथा वह विभिन्न कायाओं में प्रवेश कर सकती है, इसका वैज्ञानिक परीक्षण असंभव था इसलिए वैज्ञानिकों को स्वीकार्य भी नहीं हुआ। आत्मा ईश्वर का ही कोई रूप है, इस महायोजना को वैज्ञानिक एकदम स्वीकार नहीं कर पाए परन्तु जैनेटिक्स को मान्यता देते हुए तथा पूर्व जन्म के कर्म तथा स्मृति जीन के माध्यम से एक जन्म से दूसरे जन्म में प्रवाहित हो जाती है, को स्वीकार करके वैज्ञानिकों ने अप्रत्यक्ष रूप से कर्मफल या पुनर्जन्म के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया था।
15. बौद्ध दर्शन ने और जैन दर्शन ने पुनर्जन्म के सिद्धांत की पुनप्रüतिष्ठा की। बौद्ध दर्शन तो यहां तक मानता है कि प्रति क्षण नया जन्म होता है और प्रत्येक कण अगले क्षण मे गत क्षण की स्मृतियों को अवतरित कर लेता है। यह मत जैनेटिक्स के आधार पर भी खरा उतरता है। पाश्चात्य वैज्ञानिक अप्रत्यक्ष रूप से कुछ बातों को स्वीकार करते हैं। हैं।
स्टीफन हॉकिंग्स की नई व्याख्या
स्टीफन हॉकिंग्स ने 1988में लिखी अपनी पुस्तक की मूल अवधारणाओं से उलट नई अवधारणाएं दे दीं। इसमें उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व को ही नकार दिया है और यह कहा है कि विश्व की उत्पत्ति और उसके नियम स्वयंचालित हैं और इसके लिए किसी ईश्वर की आवश्यकता नहीं है। हम स्टीफन के कुछ पूर्व में स्वीकार किए गए तथ्यों का उल्लेख यहां करते हैं कि वे कैसे ईश्वरवादी थे और अब पलट गए हैं।
ब्लैक होल
स्टीफन हॉकिंग्स ने ब्लैक होल का सिद्धांत यह मानते हुए दिया कि किसी महाविस्फोट के समय एक सूक्ष्म बिन्दु जो अत्यंत उच्चातम तापमान पर था, ने विस्तार पाना शुरू किया। इसके तुरन्त कुछ क्षण बाद ही तापमान करो़डों डिग्री नीचे गिर गया। विश्व के अनन्त विस्तार में तापमान हर क्षण गिरता रहा। उनका मानना है कि जैसे-जैसे भौतिक सृष्टि का विस्तार होता है, केन्द्र बिन्दु का तापमान लगातार गिरता चला जाता है और वह एक अनन्त विस्तार के बाद पुन: महाविस्फोट जैसी स्थिति में आ जाता है। ऎसी कल्पनाओं को देते समय उन्होंने यह माना कि न्यूटन के गति के दूसरे नियम का उल्लंघन कहीं हो सकता है।
इस क्रम में ब्लैक होल अंतरिक्ष में कहीं-कहीं रह गये। यह antimatter या सृष्टि के विपरीत क्रम का एकमात्र केन्द्र बिन्दु नहीं था। ब्लैक होल के बारे में उनकी धारणा यह थी कि इसमें गया हुआ कोई भी प्रकाश का कण अंदर ही अंदर समाहित हो सकता है। ब्लैक होल के अंदर गये हर पदार्थ का उसमें अंदर ही समाहित हो जाना उसकी अंतिम नियति है। बहुत बाद में हॉकिंग्स ने माना कि ब्लैक होल जगत् का अंतिम स्थान नहीं है, बल्कि उसके परे भी अन्य जगत् या किसी जगत् का बाकी भाग हो सकता है। प्रारंभिक धारणा यही थी कि ब्लैक होल में कुछ भी पदार्थ या कण या कोई तरंग जाने के बाद वापस नहीं आ सकती। बाकी भाग हो सकता है। प्रारंभिक धारणा यही थी कि ब्लैक होल में कुछ भी पदार्थ या कण या कोई तरंग जाने के बाद वापस नहीं आ सकती।
महाविस्फोट से पूर्व की स्थिति में अत्यंत उच्च्तम तापमान के कारण कोई भी दो अणु या परमाणु आपस में जु़ड नहीं सकते, वे बहुत तीव्र गति से एक-दूसरे के पास-पास गमन करते रहेंगे। हम जिस भौतिक सृष्टि को देखते हैं उसके निर्माण की एक ही शर्त है कि तापमान कम होता चला जाये। जब बहुत ठण्डा हो जायेगा, तब पदार्थ के दो कण आपस में जु़डने की स्थिति में आ सकते हैं। यही सृष्टि के विस्तार और अस्तित्व का रहस्य है।
भारतीय ऋषि जिस एक सिद्धांत पर कार्य करते रहे थे, वह यही था कि अंतिम सत्य ऊर्जा और गति में निहित है। ऊर्जा भी अंतिम सत्य नहीं हो सकता, क्योंकि ऊर्जा होने या न होने से गति कम या अधिक हो सकती है। इसीलिए भारतीय ऋषियों ने गति को अंतिम स्थान दिया। यह ईश्वर के सबसे निकटतम वाला एक तथ्य है। अगर गति अनन्त हुई तो कोई भी सूक्ष्म पदार्थ ईश्वर के अस्तित्व के लगभग पास तक पहुंच जायेगा। अगर गति अत्यन्त क्षीण हुई तो वह पदार्थ का कण भौतिक सृष्टि में बदल जायेगा। वैदिक दर्शन के हजारों वर्ष बाद न्यूटन व आईन्सटीन व बाद में हॉकिंग ने इन्हीं सब तथ्यों पर अपना मस्तिष्क खपाया और किसी भी नये निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सके।
हॉकिंग्स ने यह माना कि जितना ब्लैक होल का mass (आईन्सटीन के E=MC का M) कम होगा, उतना ही अधिक उसका तापमान होगा और उतना ही अधिक तेजी से तापमान का विकिरण होगा, नतीजे के तौर पर ब्लैक होल का mass तेजी से कम होता चला जायेगा। वह यह कल्पना नब्बे के दशक में व वजन लगभग शून्य तक पहुंच जायेगा तो वह अंतिम भयानक महाविस्फोट में बदल जायेगा जोकि करो़डों हाइड्रोजन बमों की ऊर्जा के विकिरण के रूप में प्रकट होगा। हम यह कह सकते हैं कि हॉकिंग्स अपनी कल्पनाओं के जाल में यद्यपि उलझ गये थे, पर वह सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य को तब तक ईश्वर के आधीन ही मान रहे थे। अब वह पुन: मैदान में आये हैं और अपनी नई पुस्तक "द ग्रांड डिजाइन" में उन्होंने अपनी मुख्य धारणाओं को उलटते हुए ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि प्रकृति अपने स्वयं के नियमों से ही संचालित है और उसमें ईश्वर या ऎसी किसी सत्ता का अस्तित्व नजर नहीं आता। कर चुके थे कि जब ब्लैक होल का आयतन व वजन लगभग शून्य तक पहुंच जायेगा तो वह अंतिम भयानक महाविस्फोट में बदल जायेगा जोकि करो़डों हाइड्रोजन बमों की ऊर्जा के विकिरण के रूप में प्रकट होगा। हम यह कह सकते हैं कि हॉकिंग्स अपनी कल्पनाओं के जाल में यद्यपि उलझ गये थे, पर वह सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य को तब तक ईश्वर के आधीन ही मान रहे थे। अब वह पुन: मैदान में आये हैं और अपनी नई पुस्तक "द ग्रांड डिजाइन" में उन्होंने अपनी मुख्य धारणाओं को उलटते हुए ईश्वर के अस्तित्व को मानने से इंकार कर दिया है और कहा है कि प्रकृति अपने स्वयं के नियमों से ही संचालित है और उसमें ईश्वर या ऎसी किसी सत्ता का अस्तित्व नजर नहीं आता।
स्टीफन हॉकिंग्स की किसी भी कल्पना को हम ऎसे ही स्वीकार नहीं कर सकते। दुनिया में कोई भी वैज्ञानिक धरती पर दिखने वाली सामान्य-सी घटनाओं का विश्लेषण नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर :-
1. ब्रrााण्ड में जितने भी प्राणी हैं, वे साँस क्यों लेते हैं और सबकी श्वसन प्रणाली एक जैसी क्यों हैक्
2. समस्त प्राणियों की रक्त संचार प्रणाली एक जैसी क्यों हैक्
3. समस्त प्राणियों का जीवन-चक्र लगभग निर्धारित क्यों हैक्
4. भौतिक सृष्टि के अतिरिक्त समस्त प्राणियों के अंदर वह चेतना किसी न किसी रूप में क्यों रहती हैक्
5. जगत् के हर कण के अंदर एक स्मृति समूह होता है, वह अनन्त काल तक जारी रह सकता है, चाहे वह कण कितने ही पुनर्जन्म ले ले। इन स्मृतियों का भौतिक अस्तित्व से क्या संबंध हैक्
6. पुनर्जन्म की घटनायें पृथ्वी पर कहीं न कहीं मौजूद हैं। वे गत शरीर की स्मृतियों को साक्षात् करती हैं। स्टीफन हॉकिंग्स का कोई भी नियम इन घटनाओं की पुष्टि नहीं कर पायेगा।
7. गति, ऊर्जा व गुरूत्वाकर्षण बल अपने आप कैसे उत्पन्न हो गयेक् बिना कारण के कोई घटना कैसे जन्म ले सकती हैक्
8. ऊर्जा क्षय क्यों नहीं होती हैक् सृष्टि को रूप बदल-बदल कर संचालित क्यों करती हैक्
9. कोई महान योजनाकार ही इस महान सृष्टि के नियमों का संचालक हो सकता है। वैदिक ऋषियों ने ऋत् नाम की एक व्यवस्था का उल्लेख किया है, जो ईश्वरीय सत्ता का संचालन पक्ष है।
10. इन सब तर्को का उत्तर किसी के पास नहीं है, ईश्वर को किसी ने नहीं देखा। ईश्वर को तर्क या गणित से ही सिद्ध किया गया है और हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक गणित का भी सहारा नहीं ले रहे हैं। मानसिक कल्पनाओं व तर्क के सहारे ईश्वर के अस्तित्व को नकारने मे लगे हैं तथा माया के अस्तित्व को अपने कल्पना लोक के माध्यम से सिद्ध करने में लगे हैं। हम हॉकिंग्स के दिमाग के दिवालियेपन का खण्डन करते हैं। हॉकिंग जैसे वैज्ञानिकों ने सबकुछ वैदिक दर्शन से चुराया है। उनको अपनी कल्पनाओं के तर्क जाल के फ्रेम में गढ़ा है और दुनिया के सामने मनमाने ढंग से परोस दिया है। अगर हॉकिंग्स सृष्टि के रहस्य को समझ गये हैं तो अपनी आयु एक लाख वर्ष क्यों नहीं बढ़ा लेते। अपनी शारीरिक क्षमताओं को क्यों नहीं बढ़ा लेते। चार्वाक ने भी नास्तिकवाद का प्रतिपादन करके समस्त भारतीय दार्शनिकों को इस हद तक झकझोर दिया था कि कोई भी दार्शनिक अपनी धारणाओं का प्रतिपादन करने से पूर्व चार्वाक के नास्तिकवाद का खण्डन पहले करता है और अपने दर्शन का मण्डन बाद में करता है। हॉकिंग्स चार्वाक से कहीं अधिक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक हैं। वे अपनी पुस्तक "ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम" के माध्यम से संसार को समझा पाये थे कि सृष्टि का संचालन कोई महान योजनाकार ही कर रहा है। सृष्टि के रहस्यों को समझने की मानवीय सीमाओं से परे जाकर भी ईश्वर की माया को कोई समझ नहीं पाया है। उन्होंने मानव मस्तिष्क की सीमाओं से पार जाकर, जब ईश्वर के रहस्य तक नहीं पहुंच पाये तो उसे मानने से ही इंकार कर दिया है। मेरा मानना है कि हॉकिंग्स अपने शेष जीवन काल में ही सृष्टि और ईश्वर के परस्पर संबंध को मान्यता दे देंगे। अन्यथा कोई और वैज्ञानिक आयेगा और इस तथ्य की पुष्टि अपने किसी शोध के माध्यम से भविष्य में करेगा।
भारतीय दर्शन सृष्टि के त्रिआयामी होने के तथ्य को कभी भी मान्यता नहीं देते। चार या पाँच आयाम की चर्चा तो खुले आम होती है। जब ईश्वर या जीव को या आत्मा को सर्वव्याप्त, अनिर्वचनीय तथा निर्गुण माना है तो उसके अनन्त आयाम होना तर्क से सिद्ध होता है। शून्य से सृष्टि उत्पन्न हुई है और पुन: शून्य में विलीन हो जायेगी। ऎसा पुन:-पुन: होगा। हॉकिंग्स जैसे वैज्ञानिक इस तथ्य को कभी का स्वीकार कर गये हैं, परन्तु उस महाशून्य की परिभाषा कभी भी नहीं दे पाये हैं। हॉकिंग्स यह कभी भी नहीं कह पाये कि बहुत सारे ब्लैक होल मिलकर किसी दिन एक ही ब्लैक होल बन जायेंगे और वह किसी दिन महाशून्य में बदल जायेगा। पर हम भारतीय वाङग्मय में इस बात के प्रमाण पाते हैं कि ऎसा दिन महाप्रलय का दिन होता है। उस दिन ईश्वर सृष्टि के प्रलय, विलय और प्रारंभ का सूत्रपात करते हैं।