Saturday, August 21, 2010

हमारे गणेश जी

पार्वती ने माघ शुक्ल त्रयोदशी से प्रारंभ करके एक वर्ष के लिए पुन्यक नामक व्रत किया और स्वयं भगवान कृष्ण ने उनसे गणेश के रूप मे जन्म लिया। इन गणेशजी को देवताओं से पहले पूजा का वरदान मिला। इसके पश्चात् से ही अब किसी भी पूजा में पहले गणेशजी की पूजा होती है और फिर अन्य देवताओं की पूजा होती है।
गणेशजी का स्वरूप: गणेश के हाथी जैसे मुख को लेकर दो किंवदंतियां प्रसिद्ध हैं। सबसे ज्यादा प्रसिद्ध तो यह है कि माता के आदेश से गणेशजी उनके स्नान के समय बाहर द्वार पर रक्षा कर रहे थे कि उस समय भगवान शिव वहां आए और अंदर जाने का प्रयास किया। गणेश के रोकने पर भगवान क्रुद्ध हो गए और उन्होंने उसकी गर्दन उ़डा दी। उनका सिर सीधे कृष्ण लोक को चला गया। बाद में पार्वती के नाराज होने पर उन्होंने दूसरा सिर लगाने की सोची, फलस्वरूप एक हाथी का सिर आया और उसे गणेशजी के लगा दिया गया। बाद में भगवान ने उस हाथी को भी दूसरा सिर लगाकर उसका कल्याण किया और उसे उत्तम लोक प्रदान किया।
ब़डे कान, नाक, छोटी आंखें, ब़डी तोंद और हाथी का सिर। ब़डे कान से तात्पर्य अधिक श्रवण शक्ति, छोटी आंखों का मतलब भविष्य दृष्टि, ब़डी तोंद का प्रतीकात्मक तात्पर्य हर रहस्य तथ्य और अनुभव को पचा जाना और सूंड का अर्थ दूर से भी किसी व्यक्ति को पहचान लेना। गणेश की असाधारण शक्तियां अद्भुत हैं और अद्वितीय हैं।
किस चीज के देवता हैं ? ज्ञान और प्रतिभा के स्वामी हैं गणेशजी। प्रथम पूज्य हैं। विƒ विनाशक हैं, किसी भी कार्य को सम्पन्न करने से पूर्व अगर उनकी पूजा की जाए तो बाधाएं नहीं आने देते। बुद्धि और चातुर्य में उनका कोई सानी नहीं है।
गणेशजी और महाभारत- महाभारत लिखने के समय यह सवाल आया कि इतनी महान रचना को कौन लिखेगाक् भगवान वेदव्यास की गति बहुत तेज थी, उन्हें केवल गणेश पर ही भरोसा था परन्तु गणेश भी एक शर्त पर ही राजी हुए कि बोलते-बोलते बीच मे रूकेंगे नहीं, अगर बीच मे रूकेंगे तो यह महाकाव्य कभी पूरा ही नहीं होगा। बाद में वेदव्यास ने एक चतुराई चली कि गणेशजी से उन्होंने आग्रह किया कि बिना समझे वह लिखेंगे नहीं। जैसे ही व्यासजी को कुछ परेशानी हुई उन्होंने कोई कोई श्लोक ऎसा बोला जिसको कि समझने में गणेशजी को समय लगता। और इस तरह से महाभारत नाम का महाकाव्य पूरा हुआ।
मूषक उनका वाहन- इन्द्र के साथ गंधर्व नाम का क्रौंच था जो कि एक बहुत अच्छा गायक था। वो एक दिन एक संत पर हंसा। संत ने उसे श्राप दिया कि तुम अगले जन्म में मूषक के रूप मे जन्म लोगे। मूषक उस समय ऋषि पाराशर के निवास के स्थान के पास जाकर गिरा। वहां पर गणेश के एक अवतार गजानन रह रहे थे। मूषक वहां आसपास रहने वालों को तंग करता था। ऋषि पाराशर ने गजानन से कहा कि ""इस समस्या से छुटकारा दिलाओ। गजानन ने मूषक रूप में क्रौंच को पक़ड लिया और कहा कि ""मुझे तुमसे कुछ भी नहीं चाहिए पर मैं तुम्हारी सवारी करूंगा और जब मेरी इच्छा हो, तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।"" गणेश तुरन्त मूषक पर आसीन हो गए और अपना आकार तो नहीं घटाया पर वजन घटा लिया और इस तरह से उन्हें उनका वाहन मिल गया।
तुलसी का श्राप- तुलसी धर्मराज की पुत्री थीं। एक बार वो भगवान नारायण के ध्यान में घूम रही थीं कि गंगा नदी के किनारे अत्यन्त सुगंध वाला पुष्प, पल्लवयुक्त एक आश्रम देखा। गणेशजी अपने यौवन मे थे और पीले वस्त्रों मे भगवान कृष्ण की आराधना कर रहे थे। तुलसी उनसे आकर्षित हुईं और उन्हें विवाह का प्रस्ताव दिया। गणेशजी ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और कहा कि उन्हें विवाह की इच्छा नहीं है। तुलसी नाराज हुई और उन्होंने गणेश को श्राप दिया कि आप अवश्य विवाह करेंगे। इस पर गणेशजी ने भी उन्हें श्राप दिया कि आप भी अवश्य विवाह करेंगी परन्तु असुर से करेंगी और उसके बाद एक वृक्ष के रूप में जन्म लेंगी। तुलसी को जब अपनी गलती समझ में आई तो उन्होंने दया की याचना की। तब भगवान ने द्रवित होकर कहा कि - ""तुम सभी वृक्षों की श्रेष्ठ सुगंधी को धारण करोगी। देवता आपकी सुगंध से प्रसन्न होंगे। भगवान विष्णु आपकी पत्तियों से पूजे जाने पर विशेष्ा प्रसन्न होंगे परन्तु आपकी पत्तियों से की हुई पूजा को मैं स्वीकार नहीं करूंगा।"" इसके बाद गणेशजी बद्रीकाश्रम चले गए।
क्या गणेशजी अकेले हैंक्? दक्षिण भारत में मान्यता है कि गणेशजी ब्रrाचारी हैं। उसका कारण एक मिथक बताया जाता है कि गणेशजी की माता पार्वती एक सम्पूर्ण और सबसे सुन्दर स्त्री थीं और माता से उन्होंने कहा कि आपके समान ही किसी को लाएंगे तो ही विवाह करेंगे।
गणेशजी के अवतार - महोदकट विनायक- कृति युग में इस अवतार की दस भुजाएं थीं तथा देवान्तक तथा नरान्तक इत्यादि दैत्यों का विनाश किया। माता अदिति ने इन राक्षसों के संहार के लिए जब कामना की तो भगवान गणेश ने विनायक के रूप में माता अदिति से जन्म लिया। धूम्राक्ष, जृंभा, अंधक इत्यादि अन्य राक्षसों का भी इन्होंने ही विनाश किया। गणेश पुराण के अनुसार इस युद्ध में इनका एक दांत चला गया। यद्यपि दांत को लेकर और भी कई कथाएं आती हैं।
मयूरेश्वर- त्रेता युग मे भगवान गणेश ने मयूरेश्वर के नाम से अवतार लिया। सिंधु नामक दैत्य का इन्होंने संहार किया। सिंधु ने स्वर्ग पर भी कब्जा कर लिया और पाताल में रहने लगा। स्वयं माता पार्वती ने भगवान शंकर से दिए हुए एकाक्षरी गणेश मंत्र "गं" का जप किया तो भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी को मयूरेश्वर ने अवतार लिया। उन्होंने उस समय के सभी दैत्यों का विनाश किया।
गजानन- द्वापर युग मे ब्रrााजी की निद्रा के समय जंभाई लेने से सिंदूर नामक महाघोर पुरूष उत्पन्न हुआ। उन्होंने ब्रrाा को ही बाहुपाश मे भर लेना चाहा, तब ब्रrाा ने उन्हें असुर योनि में जाने का श्राप दिया। गणेशजी ने इसका विनाश किया।
धूम्रकेतु - कलियुग मे धूम्रकेतु के अवतार की कल्पना की गई है। ऎसा माना जाता है कि कलि के अंत में जब वर्णाश्रम की मर्यादा नष्ट हो जाएगी तो वह पुन: अवतार लेंगे। गणेशजी के अन्य अवतारों मे सिंह की सवारी वाले वक्रतुण्ड ने मत्सरासुर का नाश किया, मूषक वाहन एकदंत ने मदासुर का नाश किया। महोदर भी मूषक वाहन पर आसीन हैं और मोहासुर का इन्होंने विनाश किया। लम्बोदर ने क्रोधासुर का नाश किया। विकट ने कामासुर का नाश किया। विƒनराज ने ममासुर का नाश किया। धूम्रवर्ण ने अहंतासुर का विनाश किया।
मोदक- kपुराण में लिखा है कि पार्वती ने कुमार और गणेश को जन्म दिया। दोनों ने माता से मोदक मांगा। पार्वती के पास अमृत निर्मित एक दिव्य मोदक था। जिसको देने के लिए उन्होंने शर्त लगाई। दोनों मे जो भी धर्माचरण में श्रेष्ठता प्राप्त करके पूरे विश्व का भ्रमण करके, पहले आएगा उसी को शास्त्रों का मर्मज्ञ, सब तंत्रों के प्रवीण लेखक, चित्रकार, विद्वान, ज्ञान-विज्ञान का तत्वज्ञ और सर्वज्ञ कर देने वाले उस मोदक को दूंगी। स्कंध तो मयूर पर सवार होकर विश्व भ्रमण पर निकल प़डे परन्तु गणेशजी ने केवल माता-पिता की परिक्रमा कर ली, इस पर शिवजी ने भी मोदक के साथ ही उन्हें सर्वप्रथम पूजे जाने का आशीर्वाद दिया।
गणेशजी का विवाह- शिवपुराण मे गणेशजी के विवाह का उल्लेख मिलता है। हम जानते हैं कि गणपति की मूर्ति के दोनों ओर सिद्धि और बुद्धि की स्थापना भी मिलती है। बुद्धि विश्वात्मिका है, ब्रrामयी है और सिद्धि उसको विमोहित करने वाली है। गणेशजी का इनसे विवाह हुआ था। तुलसी के श्राप से गणेशजी को विवाह करना प़डा। रूद्र संहिता के कुमार खंड में इस विवाह का वर्णन मिलता है। विश्व भ्रमण का आदेश देते समय शिवजी ने दोनों पुत्रों से कहा था, जो भी पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले लौटेगा उसका विवाह पहले होगा। गणेशजी ने माता-पिता की सात परिक्रमा करके पहले विवाह का भी अधिकार प्राप्त कर लिया। बाद मे सिद्धि से क्षेम और बुद्धि से लाभ नाम के पुत्र हुए।
गणेशजी का विग्रह- रूपमंडन ग्रंथ में गणेशजी का विग्रह कैसे स्थापित हो, उसका वर्णन मिलता है। उनके बाएं ओर गजकर्ण, दाएं सिद्धि, उत्तर में गौरी, पूर्व में बुद्धि, दक्षिण पूर्व में बाल चंद्रमा, दक्षिण में सरस्वती, पश्चिम में कुबेर और पीछे की तरफ धूम्रक के विग्रहों की स्थापना होनी चाहिए। श्रीगणेश के आठों द्वारपाल वामनाकार हैं। उनका रत्न सिंहासन है जो कि इंद्र के द्वारा दिया गया है। रत्न छत्र की प्राप्ति वरूण देवता से हुई।
गणेशजी के बारह नाम- सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विƒननाशन, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन।
जन्म से पहले पूजा- कुछ लोग शंका करते हैं कि गणेश शिवजी के पुत्र हैं फिर भी शंकर के विवाह में उनका पूजन कैसे हुआक् वास्तव में गणेश किसी के पुत्र नहीं हैं, वे अज, अनादि और अनंत हैं। इन्होंने शिवजी के यहां गणपति के रूप में अवतार लिया। अत: उन्हें शिव विवाह में पूजा गया।
विƒ गण- असुर, ब्राrाण और देवताओं को सताते थे। गणेशजी को यह वरदान था कि जो उनकी पूजा नहीं करेंगे, उन्हें वे विƒनों द्वारा बाधा पहुंचाएंगे। गणेशजी ने दैत्यों के धर्मकार्य में विƒ पहुंचाना प्रारंभ कर दिया जिससे कि उनकी सफलता में बाधा आने लगी। जो आदि गणेश हैं, उन्हें ही कृष्ण माना गया है।
एकदंत- कहते हैं कि भगवान शिव के सिर काटने पर देवताओं ने जिस हाथी को तलाश किया और उसका सिर काटकर गणेशजी के लगाने के लिए लाए, वह एकदंत ही था। मुद्गल पुराण में एक माया का प्रतीक है और दंत माया चालक सत्ता का प्रतीक है।
षोडश मातृका में गणेश- प्रत्येक अनुष्ठान में गणपति, पंचदेव, षोडश मातृकाएं, नवग्रह एवं वरूण इत्यादि की स्थापनाएं आवश्यक मानी जाती हैं। षोडश मातृकाओं में भी एक कोण पर गणेश की स्थापना की जाती है। वैसे भी गणेश को पंचलोकपालों में प्रधानता है।
कलाओं में गणेशजी- गणेशजी मूर्तिकारों और चित्रकारों के बीच मे अत्यन्त प्रसिद्ध हैं और उनके इतनी तरह के विग्रह बनाए गए हैं कि एक अलग ही कला क्षेत्र विकसित हो गया है। गणेशजी का प्रसार अत्यधिक हुआ है और वे पूरे विश्व में किसी किसी रूप मे कहीं कहीं उपस्थित मिलते हैं। जनमानस में भी गणेशजी इस तरह से छाए हुए हैं कि प्रत्येक कार्य को सफल बनाने के लिए पहले उनका पूजन किया जाता है और बाद में उनसे विƒनों के नाश की कामना की जाती है। अगर किसी का विवाह हो तो पहला कार्ड गणेशजी को अर्पित किया जाता है। किसी को कुछ लिखना हो तो कागज पर सबसे पहले ú गणेशाय नम: लिखा जाता है।
विदेशों में गणेशजी- कम्बोडिया में भगवान को केनेस कहते हैं। नेपाल में हैरम्ब और विनायक के नाम से गणपति की मूर्तियां हैं। जावा में नदियों के घाटों और अन्य भय के स्थानों पर अनेक गणेश प्रतिमाएं हैं। इण्डोनेशिया में तो हर द्वार पर गणेशजी मिलेंगे चाहे वह किसी भी धर्म का मानने वाला इण्डोनेशिया में गणपति के आधार पर नाम रखने को शुभ माना जाता है।

कृष्ण

शायद भारत के सबसे अधिक पूजे जाने वाले कृष्ण का चरित्र अत्यन्त रहस्यमय बताया गया है। यद्यपि उनका हर कर्म सार्वजनिक है और उनके द्वारा दिया गया गीता का दर्शन संसार के अद्भुत दर्शनों में माना गया है। वे ऎसे अवतार बताए गए हैं जिन्होंने अपनी लीलाओं का प्रदर्शन बचपन से ही करना शुरू कर दिया था।
उत्पत्ति: कृष्ण को लेकर ब्रrावैवर्तपुराण और गर्गसंहिता में प्रमाणिक उल्लेख मिलते हैं। गर्ग यादव कुल के आचार्य थे। विक्रमादित्य के नवरत्न वराहमिहिर ने अपने लेखन कार्य में महर्षि गर्ग का उल्लेख बार-बार किया है। ब्रrावैवर्तपुराण में सृष्टि की उत्पत्ति का कारण कृष्ण को माना गया है। इस पुराण में उनके रूप और उनसे उत्पन्न सभी जीवों का वर्णन किया गया है। ब्रrावैवर्तपुराण पढ़ने के बाद यह लगता है कि वे ही ईश्वर हैं और अन्य सभी कुछ उन्हीं से उत्पन्न हुआ है।
कृष्ण के संबंध: कृष्ण के जो संबंध बताए गए हैं उनमें मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, बृज के अन्य क्षेत्र, द्वारिका के अतिरिक्त पाण्डवों से जु़डे हुए महत्व के सभी स्थान जैसे कि कुरूक्षेत्र या हस्तिनापुर इत्यादि अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। गौलोक से पृथ्वी पर अवतरित सभी ऋषि-मुनि व गोपियां भी कृष्ण से अनन्य भाव से संबंधित मानी गई हैं।
ज्योतिष में कृष्ण:
ज्योतिषशास्त्र मे कृष्ण को ज्ञात अज्ञात रूप से कई तरीके से जाना जाता है। महाभारत में भगवान कृष्ण ने ज्योतिष का खुलकर प्रयोग किया था। महाभारत का मुहूर्त, वनवास के बाद पाण्डवों के पुन: प्रकट होने पर वनवास अवधि को लेकर हुई बहस, जयद्रथ वध में सूर्य ग्रहण का ज्ञान, पाण्डवों के लिए बनवाए महल में वास्तु, आचार्य मयासुर को निमंत्रण, शक्रध्वज (अर्जुन के रथ में ध्वज प्रयोग) जैसी अनेक परिस्थितियां हैं जिनमें ज्योतिष का प्रयोग भगवान कृष्ण द्वारा जीत के लिए किया गया है।
चन्द्रमा और कृष्ण: चन्द्रमा से कृष्ण का संबंध बहुत घनिष्ठ रूप से माना गया है। कृष्ण जिस मोरपंख का प्रयोग करते हैं उसमें चन्दूला (जिसमें अग्रभाग में चन्द्रमा जैसी गोल आकृति होती है) सर्वप्रमुख है। भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास की जिस अष्टमी को हुआ था, उस दिन रोहिणी नक्षत्र था अर्थात् चन्द्रमा रोहिणी के नक्षत्र में गोचर कर रहे थे। अत: भगवान कृष्ण का जन्म चन्द्रमा के नक्षत्र में हुआ था। हम सभी जानते हैं कि चन्द्रमा के कुल मिलाकर तीन नक्षत्र हैं- रोहिणी, हस्त एवं श्रवण। ज्योतिष में मान्यता है कि इन तीनों नक्षत्र में जो जन्म लेता है, वह कृष्ण भक्त हो जाता है। उसकी जीवनभर कुछ भी मान्यताएं चलें आखिर में वह कृष्ण भक्ति की ओर मु़डता है। उच्चा के चंद्रमा या कर्क राशि के चन्द्रमा या पूर्ण चन्द्र के दिन जिसका जन्म हो वह आवश्यक रूप से कृष्ण भक्ति में लीन हो जाता है। चन्द्रमा की 27 नक्षत्र पत्नियां जो कि दक्ष प्रजापति की पुत्रियां थीं, में से सबसे अधिक प्रिय रोहिणी थीं जिनको लेकर चन्द्रमा श्रापित भी हुए परन्तु भगवान कृष्ण ने रोहिणी नक्षत्र मे जन्म लेकर इसे अत्यन्त महत्व प्रदान कर दिया।
कृष्ण और संतान प्राप्ति: संतान प्राप्ति के जितने भी उपाय ज्योतिष में बताए गए हैं, उनमें चन्द्रमा या कृष्ण से संबंधित बातें अवश्य आती हैं। संतानोत्पत्ति के जितने भी फार्मूले हैं, उनमें कृष्ण की भक्ति प्रमुखता से बताई गई है। आयुर्वेद में भी कृष्ण के पूजा-पाठ के अलावा जिन औषधियों की चर्चा है, उनमें चन्द्रमा के नक्षत्र प्रमुख हैं। मयूर पंख भस्म को पुत्रोत्पत्ति के संदर्भ में प्रयोग लिया जाता है। इस प्रयोग में चन्दूला ही काम में लिया जाता है।
कृष्ण चन्द्रमा से पीç़डत भी हुए। चौथ के चन्द्रमा का कलंक भगवान कृष्ण पर भी लगा। वह इतना प्रसिद्ध हुआ कि सुन्दरकाण्ड में तुलसीदासजी ने भी उसकी चर्चा की है।
ज्योतिष के योग: ज्योतिष के अधिकांश योगों में जिनमें चन्द्रमा के श्रेष्ठ हो जाने के फल हैं या चन्द्रमा के कारण योग के बनने के फल हैं उनमें व्यक्ति के जीवन मे कृष्ण भक्ति की प्रधानता आती है। रोहिणी नक्षत्र से 180 पर स्थित नक्षत्र ज्येष्ठा का संबंध कृष्ण व बलराम से जो़डा गया है। रोहिणी का उत्तरार्द्ध और ज्येष्ठा का प्रथमार्द्ध कृष्ण या बलराम में भक्ति उत्पन्न करने वाले माने गए हैं।
जन्म चक्र: जन्म चक्र में केन्द्र और त्रिकोण को विष्णु और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। दोनों के संबंध होने मात्र से राजयोगजनित लक्ष्मी का उद्भव माना गया है। स्वर्गलोक में इस लक्ष्मी को स्वर्ग लक्ष्मी कहा गया है तथा राजाओं के यहां वे राजलक्ष्मी कहलाती हैं। जन्म चक्र में केन्द्र और त्रिकोण को लक्ष्मी और विष्णु के रूप में इसीलिए प्रतिपादित किया गया है क्योंकि राजाओं से आश्रय प्राप्त ज्योतिष मनीषियों ने राजयोग व राजलक्ष्मी का बहुत अधिक वर्णन किया है।
ब्रrावैवर्त पुराण के ब्रrाखण्ड में श्रीकृष्ण से नारायण, महादेव, ब्रrाा, धर्म, सरस्वती, महालक्ष्मी और प्रकृति (दुर्गा) का प्रादुर्भाव माना गया है और उन्होंने उत्पत्ति के बाद कृष्ण की स्तुति की है।
कृष्ण से उत्पन्न ब्रrाा इत्यादि ने आगे चलकर ब्रrााण्ड की रचनाएं की हैं और अपनी मानसी सृष्टि को स्वरूप दिया है।
कृष्ण और द्वादश आदित्य: सूर्य के बारह स्वरूपों को द्वादश आदित्य के नाम से प्रसिद्धि मिली है। ये विभिन्न काल में हुए और उन्हें अलग-अलग कारणों से अलग-अलग नाम दिए गए। महाभारत के आदिपर्व में धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरूण, अंश, भग, वैवस्वान, पूषा, सविता, त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गए। वास्तु चक्र और सर्वतोभद्र, लिङग्तोभद्र जैसे मंडलों मे विष्णु की प्रतिष्ठा है। यही विष्णु आधुनिक सूर्य कहे गए हैं और इंद्र से कनिष्ठ होते हुए यह द्वादश आदित्य आज सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। हम जानते हैं कि कृष्ण और विष्णु का परस्पर संबंध है।
तदेवं भगवान् भास्वान् वेदात्मा वेदसंस्थित:।
वेदविद्यात्मकश्चैव पर: पुरूष उच्यते
मार्कण्डेयपुराण में कहा गया है कि यह भगवान भास्कर, ब्रrाा, विष्णु, रूद्र बनकर सृष्टि, स्थिति और संहार करते हैं, अत: आदित्य और कृष्ण में संबंध स्थापित होता है और आदित्य को ज्योतिष और जन्मचक्र में सबसे अधिक प्रधानता मिली है। कलियुग मे इसीलिए कृष्ण को सबसे अधिक मान्यता मिली। इस्कॉन जैसे संगठनों ने कृष्ण को सारे विश्व में महिमामंडित किया है।
कृष्ण की पृथ्वी पर अवधि: ब्रrावैवर्तपुराण के प्रकृति खण्ड में यह विवरण मिलता है कि सरस्वती, गंगा और पद्मावती अपने नदी रूप का परित्याग करके बैकुण्ठ चली जाएंगी। कलि के पांच हजार वर्ष बीतने पर काशी तथा वृन्दावन के अतिरिक्त प्राय: सभी तीर्थ भगवान श्रीहरि की आज्ञा से, उन देवियों के साथ बैकुण्ठ चले जाएंगे। सालिगराम श्रीहरि की मूर्ति व भगवान जगन्नाथ कलि के दस हजार वर्ष बीतने पर भारत वर्ष को छो़डकर अपने धाम को पधारेंगे। इसके साथ ही साधु, पुराण, शंख, श्राद्ध, तर्पण, वेदोक्त कर्म, देव पूजा, देवनाम, देवताओं के गुणों का कीर्तन, वेद शास्त्र, पुराण, संत, सत्य, धर्म, ग्राम देवता, व्रत, तप और उपहास ये सब भी इस भारत से चले जाएंगे अर्थात् लोगों की श्रद्धा इनमें नहीं रहेगी। कलियुग मे बहुत बाद में भगवान नारायण के अंश के रूप में विष्णु यशा नामक ब्राrाण के घर से भगवान कल्कि के अवतार की कामना की गई है। पृथ्वी की शुद्धि के बाद वे पुन: अंतध्र्यान हो जाएंगे।
श्रीकृष्ण के अंश: ब्रrाा, शिव, शेष, गणेश, कूर्म, धर्म, नारायण, नर और कार्तिकेय, ये सब कृष्ण के नौ अंश माने गए हैं। कृष्ण या विष्णु और शिव दोनों से ही नाग का संबंध माना गया है। संभवत: सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय दोनों में ही नाग की अनिवार्यता मानी गई है। नाग या सर्पगति का समीकरण माया की उत्पत्ति से किया जा सकता है। अगर सर्पगति है तो ही सृष्टि की उत्पत्ति है। सृष्टि के संहार के बाद सर्पगति समाप्त हो जाती है इसीलिए भारतीय वाङग्मय में सर्प को अत्यधिक प्रतिष्ठा मिली है। कद्रू पत्नी नाग माता पृथ्वी पर रोहिणी के रूप में प्रकट हुई थीं। इन्हीं रोहिणी के उदर मे देवकी का सातवां गर्भ योगमाया ने कृष्ण की आज्ञा से स्थापित कर दिया था।